एक बुढ़िया थी| वह गणेश जी की बहुत पूजा किया करती थी| उसकी बहू को यह पसंद नही था| एक दिन उसकी बहू ने गणेश जी की मूर्ति को कुएँ में फेंक दिया| बुढ़िया बहुत दुखी हुई| वह नगर में निकल कर रास्ते में जो भी मिलता उसको बोलती कि"कोई मेरे गणेशजी बना दो", पर किसी ने उसके लिए गणेशजी नहीं बनाए| चलते चलते एक जगह पहुँची जहाँ राजा का महल बन रहा था| उसने कारीगर से कहा "तुम मेरे लिए गणेश जी बना दो"| कारीगर ने कहा,"जितनी देर में तेरे गणेशजी बनाएँगे उतनी देर में तो हम न जाने कितना महल खड़ा कर देंगे"| बुढ़िया दुखी होकर आगे बढ़ गयी| जैसे ही बुढ़िया वहाँ से गयी, राजा का महल टेढ़ा हो गया| कारीगर दौड़े दौड़े राजा के पास गये| राजा के पूछने पर कारीगर ने बताया की बुढ़िया के जाने के बाद ही महल टेढ़ा हो गया| तब राजा भागा भागा बुढ़िया के पास पहुँचा| बुढ़िया से पूछा,"अम्मा तूने एसा क्या जादू टोना किया की मेरा महल टेढ़ा हो गया?, गणेशजी क्या, मैं तो तेरे लिए गणेश जी का मंदिर बनवा दूँगा"| जैसे ही बुढ़िया का मंदिर बन के तैयार हुआ, वैसे ही राजा का महल सीधा हो गया| इस तरह जैसे भगवान गणेश ने राजा और बुढ़िया पर कृपा बनाई, वैसे ही वह सब भक्तों पर कृपा बनाए रखें| बोलो गणेश भगवान की जय!!
while going these day's complicated life schedule, we want our things group wise collected at one place and nicely organized. Through this blog i am trying to keep some traditional collection of songs, clothes, stories etc, and to provide a simple way for day to day life. I hope that will be helpful for my blog visitors.
Monday, May 26, 2014
Tuesday, May 20, 2014
White Sauce Vegetable Sandwich
Recently my sister got married. She learned many recipes from her mother-in-law. One of those is making white sauce Vegetable sandwich at home. I also gave a trial and got success. It was very good in taste.
Ingredients for White Sauce:
Ingredients for White Sauce:
Maida ( Refined Flour ) - 2 Table Spoons
Ghee - 1 Tea Spoon
Milk - 1/2 glass (Half Glass)
salt
Kali Mirch ( Black Pepper )
Vinegar - 1 Tea Spoon
Ingredients for Sandwich:
Bread
Carrot - 1 small
Cabbage - half piece
Capsicum - 1 piece
Onion - half piece
Hari Mirch ( Green Chillies ) - 1 piece
Method:
1) First fine chop all vegetables ( Carrot, Cabbage, Capsicum, Onion ), wash and keep aside.
2) Take little amount of ghee in a pan. Add all chopped vegetables. Fry till it becomes brown. Keep aside.
3) Take a pan. Dry fry the Maida (Purpose flour) till it becomes brown. In between add ghee or butter. Add Milk. keep mixing. It will become thick. Add all fried vegetables. Add salt, black pepper, vinegar.
4) Cook for 3 min.
5) Make it cool. Filling for Sandwich is ready.
6) Fill this filling between two bread piece. Cook in a Sandwich Toaster. We can bake it in Microwave also.
7) Ready to serve.
Monday, May 12, 2014
गौकर्णोपाख्यान प्रारंभ ( Story of Goukarn or Gokarn )
श्रीमद् भागवत चौथा अध्याय
सन्यासी ने पूछा- कहो ब्राम्हन देवता! रोते क्यू हो? तुम्हें एसी क्या भारी चिंता है?
ब्राम्हन ने कहा- महाराज! देवता और ब्राम्हन मेरा दिया हुआ प्रसन्न मन से स्वीकार नही करते| संतान के लिए मैं इतना दुखी हो गया हू कि मुझे सब सूना ही सूना दिखाई देता है| मैं प्राण त्यागने के लिए यहाँ आया हू| मैं जिस गाय को पालता हूँ वो भी सर्वथा बांझ हो जाती है| जो पेड़ लगाता हूँ , उस पर भी फल फूल नहीं लगते| एसा कह कर वह ब्राम्हन महात्मा के चरणों में फूट फूट कर रोने लगा|
महात्मा योगनिष्ठ थे| उन्होने ब्राम्हन के ललाट की रेखाएँ देख सारा वृतांत जान लिया था| फिर वे बोले- ब्राम्हन देवता! कर्म की गति प्रबल है| विवेक का आश्रय लेकर संसार की वासना छोड़ दो| मैने इस समय तुम्हारा प्रारब्ध देखकर यह निश्चित किया है कि तुम्हारे सात जन्म तक किसी प्रकार से कोई संतान नहीं हो सकती है|
ब्राम्हन ने कहा- महात्मा जी! विवेक से मेरा क्या होगा? मुझे तो बल पूर्वक पुत्र दीजिए| नहीं तो मैं आपके सामने ही प्राण त्याग दूँगा|
ब्राम्हन का एसा आग्रह देखकर महात्मा ने कहा- विधाता के लेख को मिटाने का हट करने से राजा चित्रकेतु को बड़ा भारी कष्ट उठाना पड़ा था| फिर भी जब ब्राम्हन ने किसी प्रकार अपना हट नहीं छोड़ा तो महात्मा ने उसे एक फल देकर कहा- इसे अपनी पत्नी को खिला देना| इससे उसको एक पुत्र होगा| तुम्हारी स्त्री को एक साल तक सत्य, दया, दान और एक समय ही भोजन करने के नियम का पालन करना चाहिए| यदि एसा करेगी तो बालक शुद्ध स्वाभाव वाला होगा| यों कह कर योगिराज चले गये और ब्राम्हन अपने घर चला आया| उसने वह फल अपनी स्त्री को दे दिया और स्वयं कहीं चला गया|
उसकी स्त्री रो रो कर अपनी सखी से कहने लगी- सखी! मुझे तो बड़ी चिंता हो गयी| मैं यह फल नहीं खाऊंगी| फल खाने से गर्भ होगा| गर्भ से पेट बढ़ेगा| फिर कुछ खाया पिया नहीं जाएगा और फिर मेरी शक्ति क्षीण हो जाएगी| तब बता! घर का धंधा केसे होगा| और यदि गाँव में डांकूओं का आक्रमण हो गया तो गर्भिनि स्त्री कैसे भागेगी? यदि शुक देव जी की तरह यह गर्भ भी पेट में ही रह गया तो इसे बाहर कैसे निकाला जाएगा? और फिर यदि प्रसव काल के समय यदि गर्भ टेढ़ा हो गया तो प्राणों से ही न हाथ धोना पड़े| यों भी प्रसव के समय बड़ी भयंकर पीड़ा होती है| और जब मैं दुर्बल पड़ जाउंगी तो ननद रानी आकर घर का सारा माल समेट कर ले जाएगी|
मन में एसे ही तरह तरह के कुतर्क उठने के कारण ब्राम्हनि ने वह फल नहीं खाया| जब उसके पति ने पूछा की "फल खा लिया? " तब उसने कह दिया-"हाँ, खा लिया| "
एक दिन ब्राम्हनि की बहिन उसके घर आई तो उसने सारा वृतांत उसे सुना कर कहा- बहिन! मेरे मन में बड़ी चिंता है, बता मैं क्या करूँ?
बहिन ने कहा- मेरे पेट में बच्चा है| प्रसव होने पर बालक को मैं तुझे दे दूँगी, तू तब तक गर्भवती होने का नाटक करती रह| तू मेरे पति को कुछ धन दे देगी तो वह तुझे अपना बालक दे देंगे| हम एसी युक्ति करेंगे कि सब लोग यही सोचेंगे की मेरा बालक 6 महीने का होकर मर गया| और मैं नित्य प्रति तेरे घर आकर तेरे बालक का भरण पोषण करती रहूंगी| तू इस समय इस फल की जाँच करने के लिए इसे गाय को खिला दे|
ब्राम्हनि ने वही किया जो उसकी बहिन ने कहा था| कुछ समय पश्चात जब उसकी बहिन को पुत्र हुआ तो उसने वह धूंधुलि को दे दिया| इस प्रकार आत्मदेव को पुत्र हुआ सुनकर लोगों को बड़ा आनंद हुआ| धूंधुलि ने उसका नाम धूंधुकारी रखा| इसके 3 महीने बीतने पर गाय को भी एक मनुष्यकार पुत्र हुआ| वह सुंदर, दिव्य, स्वर्ण की कांता वाला था| ब्राम्हन ने स्वयं ही उसके सभी संस्कार किए| उसके गाय के जैसे कान देख कर उसने उसका नाम गौकर्ण रखा|
कुछ काल बीतने पर दोनो बालक जवान हो गये| उनमें गौकर्ण पंडित एवम् ज्ञानी हुआ| किंतु धूंधुकारी बड़ा ही दुष्ट निकला| क्रोध उसमें बढ़ चढ़ के भरा था| हिंसा का उसे व्यसन हो गया था| वैश्याओं के जाल में पड़ कर उसने पिता की सारी संपत्ति नष्ट कर दी थी| एक दिन माता पिता को पीट कर वह घर से सारा धन लेकर चला गया|
यह देखकर आत्मदेव बड़ा ही दुखी होकर बोला-एसे कुपुत्र से तो बांझ होना उचित है| उसी समय गौकर्ण जी वहाँ आए और पिता को वैराग्य का उपदेश देते हुए कहा- पिताजी! यह संसार दुख और मोह में डालने वाला है| "यह मेरा पुत्र है", इस अज्ञान को छोड़ दीजिए और वन में चले जाइए|
गौकर्ण के वचन सुनकर आत्मादेव वन में जाने को तैयार हो गया| उसने पूछा- बेटा! वन में जाकर मैं क्या करूँ? मेरा उद्धार करो|
गौकर्ण ने कहा- पिताजी! आप इस शरीर को "मैं" मानना छोड़ दे.| संसार की किसी भी वस्तु को स्थाई न समझें| यह नश्वर है| एकमात्र भगवतसेवा और भगवान की कथाओं का रसपान करें|
इस प्रकार पुत्र की वाणी से प्रभावित होकर आत्मदेव ने घर छोड़ दिया और वन में दिन रात भगवान की सेवा पूजा से तथा भागवत के दशम स्कंध का पाठ करने से उसने भगवान श्री कृष्णचंद्र को प्राप्त कर लिया|
Tuesday, May 6, 2014
भैया दूज की कहानी ( Bhai Duj ki Kahani )
एक बुढ़िया थी| उसके सात बेटे और एक बेटी थी| बेटी की शादी हो चुकी थी| जब भी उसके बेटे की शादी होती, फेरों के समय एक नाग आता और उसके बेटे को डस लेता था| बेटा वही ख़तम हो जाता और बहू विधवा| इस तरह उसके छह बेटे मर गये | सातवे की शादी होनी बाकी थी| इस तरह अपने बेटों के मर जाने के दुख से बुढ़िया रो रो के अंधी हो गयी थी|
भाई दूज आने को हुई तो भाई ने कहा की मैं बहिन से तिलक कराने जाऊँगा| माँ ने कहा ठीक है|
उधर जब बहिन को पता चला की उसका भाई आ रहा है तो वह खुशी से पागल होकर पड़ोसन के गयी और पूछने लगी की जब बहुत प्यारा भाई घर आए तो क्या बनाना चलिए? पड़ोसन उसकी खुशी को देख कर जलभुन गयी और कह दिया कि," दूध से रसोई लेप, घी में चावल पका| " बहिन ने एसा ही किया|
उधर भाई जब बहिन के घर जा रहा था तो उसे रास्ते में साँप मिला| साँप उसे डसने को हुआ|
भाई बोला- तुम मुझे क्यू डस रहे हो?
साँप बोला- मैं तुम्हारा काल हूँ| और मुझे तुमको डसना है|
भाई बोला- मेरी बहिन मेरा इंतजार कर रही है| मैं जब तिलक करा के वापस लौटूँगा, तब तुम मुझे डस लेना|
साँप ने कहा- भला आज तक कोई अपनी मौत के लिए लौट के आया है, जो तुम आऔगे|
भाई ने कहा- अगर तुझे यकीन नही है तो तू मेरे झोले में बैठ जा| जब मैं अपनी बहिन के तिलक कर लू तब तू मुझे डस लेना| साँप ने एसा ही किया|
भाई बहिन के घर पहुँच गया| दोनो बड़े खुश हुए|
भाई बोला- बहिन, जल्दी से खाना दे, बड़ी भूख लगी है|
बहिन क्या करे| न तो दूध की रसोई सूखे, न ही घी में चावल पके|
भाई ने पूछा- बहिन इतनी देर क्यूँ लग रही है? तू क्या पका रही है?
तब बहिन ने बताया कि एसे एसे किया है|
भाई बोला- पगली! कहीं घी में भी चावल पके हैं , या दूध से कोई रसोई लीपे है| गोबर से रसोई लीप, दूध में चावल पका|
बहिन ने एसा ही किया| खाना खा के भाई को बहुत ज़ोर नींद आने लगी| इतने में बहिन के बच्चे आ गये| बोले-मामा मामा हमारे लिए क्या लाए हो?
भाई बोला- में तो कुछ नही लाया|
बच्चो ने वह झोला ले लिया जिसमें साँप था| जेसे ही उसे खोला, उसमे से हीरे का हार निकला|
बहिन ने कहा- भैया तूने बताया नही की तू मेरे लिए इतना सुंदर हार लाए हो|
भाई बोला- बहना तुझे पसंद है तो तू लेले, मुझे हार का क्या करना|
अगले दिन भाई बोला- अब मुझे जाना है, मेरे लिए खाना रख दे| बहिन ने उसके लिए लड्डू बना के एक डब्बे मे रख के दे दिए|
भाई कुछ दूर जाकर, थक कर एक पेड़ के नीचे सो गया| उधर बहिन के जब बच्चों को जब भूख लगी तो माँ से कहा की खाना दे दो|
माँ ने कहा- खाना अभी बनने में देर है| तो बच्चे बोले कि मामा को जो रखा है वही दे दो| तो वह बोली की लड्डू बनाने के लिए बाजरा पीसा था, वही बचा पड़ा है चक्की में, जाकर खा लो| बच्चों ने देखा कि चक्की में तो साँप की हड्डियाँ पड़ी है|
यही बात माँ को आकर बताई तो वह बावड़ी सी हो कर भाई के पीछे भागी| रास्ते भर लोगों से पूछती की किसी ने मेरा गैल बाटोई देखा, किसी ने मेरा बावड़ा सा भाई देखा| तब एक ने बताया की कोई लेटा तो है पेड़ के नीचे, देख ले वही तो नहीं| भागी भागी पेड़ के नीचे पहुची| अपने भाई को नींद से उठाया| भैया भैया कहीं तूने मेरे लड्डू तो नही खाए!!
भाई बोला- ये ले तेरे लड्डू, नहीं खाए मैने| ले दे के लड्डू ही तो दिए थे, उसके भी पीछे पीछे आ गयी|
बहिन बोली- नहीं भाई, तू झूठ बोल रहा है, ज़रूर तूने खाया है| अब तो मैं तेरे साथ चलूंगी|
भाई बोला- तू न मान रही है तो चल फिर|
चलते चलते बहिन को प्यास लगती है, वह भाई को कहती है की मुझे पानी पीना है|
भाई बोला- अब मैं यहाँ तेरे लिए पानी कहाँ से लाउ| देख ! दूर कहीं चील उड़ रहीं हैं,चली जा वहाँ शायद तुझे पानी मिल जाए|
तब बहिन वहाँ गयी, और पानी पी कर जब लौट रही थी तो रास्ते में देखती है कि एक जगह ज़मीन में 6 शिलाए गढ़ी हैं, और एक बिना गढ़े रखी हुई थी| उसने एक बुढ़िया से पूछा कि ये शिलाएँ कैसी हैं|
उस बुढ़िया ने बताया कि- एक बुढ़िया है| उसके सात बेटे थे| 6 बेटे तो शादी के मंडप में ही मर चुके हैं, तो उनके नाम की ये शिलाएँ ज़मीन में गढ़ी हैं, अभी सातवे की शादी होनी बाकी है| जब उसकी शादी होगी तो वह भी मंडप में ही मर जाएगा, तब यह सातवी सिला भी ज़मीन में गड़ जाएगी|
यह सुनकर बहिन समझ गयी ये सिलाएँ किसी और की नही बल्कि उसके भाइयों के नाम की हैं| उसने उस बुढ़िया से अपने सातवे भाई को बचाने का उपाय पूछा| बुढ़िया ने उसे बतला दिया कि वह अपने सातवे भाई को केसे बचा सकती है| सब जान कर वह वहाँ से अपने बॉल खुले कर के पागलों की तरह अपने भाई को गालियाँ देती हुई चली|
भाई के पास आकर बोलने लगी- तू तो जलेगा, कुटेगा, मरेगा|
भाई उसके एसे व्यवहार को देखकर चोंक गया पर उसे कुछ समझ नही आया| इसी तरह दोनो भाई बहिन माँ के घर पहुँच गये| थोड़े समय के बाद भाई के लिए सगाई आने लगी| उसकी शादी तय हो गयी|
जब भाई को सहरा पहनाने लगे तो वह बोली- इसको क्यू सहरा बँधेगा, सहारा तो मैं पहनूँगी| ये तो जलेगा, मरेगा|
सब लोगों ने परेशान होकर सहरा बहिन को दे दिया| बहिन ने देखा उसमें कलंगी की जगह साँप का बच्चा था| बहिन ने उसे निकाल के फैंक दिया|
अब जब भाई घोड़ी चढ़ने लगा तो बहिन फिर बोली- ये घोड़ी पर क्यू चढ़ेगा, घोड़ी पर तो मैं बैठूँगी, ये तो जलेगा, मरेगा, इसकी लाश को चील कौवे खाएँगे| सब लोग बहुत परेशान | सब ने उसे घोड़ी पर भी चढ़ने दिया|
अब जब बारात चलने को हुई तब बहिन बोली- ये क्यू दरवाजे से निकलेगा, ये तो पीछे के रास्ते से जाएगा, दरवाजे से तो मैं निकलूंगी| जब वह दरवाजे के नीचे से जा रही थी तो दरवाजा अचानक गिरने लगा| बहिन ने एक ईंट उठा कर अपनी चुनरी में रख ली, दरवाजा वही की वही रुक गया| सब लोगों को बड़ा अचंभा हुआ|
रास्ते में एक जगह बारात रुकी तो भाई को पीपल के पेड़ के नीचे खड़ा कर दिया|
बहिन कहने लगी- ये क्यू छाव में खड़ा होगा, ये तो धूप में खड़ा होगा| छाँव में तो मैं खड़ी होगी|
जैसे ही वह पेड़ के नीचे खड़ी हुई, पेड़ गिरने लगा| बहिन ने एक पत्ता तोड़ कर अपनी चुनरी में रख लिया, पेड़ वही की वही रुक गया| अब तो सबको विश्वास हो गया की ये बावली कोई जादू टोना सिख कर आई है, जो बार बार अपने भाई की रक्षा कर रही है| एसे करते करते फेरों का समय आ गया|
जब दुल्हन आई तो उसने दुल्हन के कान में कहा- अब तक तो मैने तेरे पति को बचा लिया, अब तू ही अपने पति को और साथ ही अपने मरे हुए जेठों को बचा सकती है|
फेरों के समय एक नाग आया, वो जैसे ही दूल्हे को डसने को हुआ , दुल्हन ने उसे एक लोटे में भर के उपर से प्लेट से बंद कर दिया| थोड़ी देर बाद नागिन लहर लहर करती आई|
दुल्हन से बोली- तू मेरा पति छोड़|
दुल्हन बोली- पहले तू मेरा पति छोड़|
नागिन ने कहा- ठीक है मैने तेरा पति छोड़ा|
दुल्हन- एसे नहीं, पहले तीन बार बोल|
नागिन ने 3 बार बोला, फिर बोली की अब मेरे पति को छोड़|
दुल्हन बोली- एक मेरे पति से क्या होगा, हसने बोलने क लिए जेठ भी तो होना चाहिए, एक जेठ भी छोड़|
नागिन ने जेठ के भी प्राण दे दिए|
फिर दुल्हन ने कहा- एक जेठ से लड़ाई हो गयी तो एक और जेठ छोड़| वो विदेश चला गया तो तीसरा जेठ भी छोड़|
इस तरह एक एक करके दुल्हन ने अपने 6 जेठ जीवित करा लिए|
उधर रो रो के बुढ़िया का बुरा हाल था| कि अब तो मेरा सातवा बेटा भी बाकी बेटों की तरह मर जाएगा| गाँव वालों ने उसे बताया कि उसके सात बेटा और बहुए आ रही है
तो बुढ़िया बोली- गर यह बात सच हो तो मेरी आँखो की रोशनी वापस आ जाए और मेरे सीने से दूध की धार बहने लगे| एसा ही हुआ| अपने सारे बहू बेटों को देख कर वह बहुत खुश हुई,
बोली- यह सब तो मेरी बावली का किया है| कहाँ है मेरी बेटी?
सब बहिन को ढूँढने लगे| देखा तो वह भूसे की कोठरी में सो रही थी| जब उसे पता चला कि उसका भाई सही सलामत है तो वह अपने घर को चली| उसके पीछे पीछे सारी लक्ष्मी भी जाने लगी|
बुढ़िया ने कहा- बेटी, पीछे मूड के देख! तू सारी लक्ष्मी ले जाएगी तो तेरे भाई भाभी क्या खाएँगे|
तब बहिन ने पीछे मूड के देखा और कहा- जो माँ ने अपने हाथों से दिया वह मेरे साथ चल, बाद बाकी का भाई भाभी के पास रह|
इस तरह एक बहिन ने अपने भाई की रक्षा की|
Monday, May 5, 2014
भक्ति के कष्ट का निवारण ( Bhakti ke Kasht ki Nivriti )
श्रीमद् भागवत तीसरा अध्याय
जब भगवान श्रीकृष्ण इस धराधर को छोड़कर अपने नित्य धाम को पधारने लगे, तब उद्धवजी ने उनसे पूछा:
उद्धवजी कहते हैं- गोविंद! आप तो अपने भक्तों के कार्य करके परम धाम पधारना चाहते हैं| अब तो कलियुग आया ही समझो| इसलिए संसार में फिर अनेकों दुष्ट प्रकट हो जाएँगे| तब उनके भार से पृथ्वी दब कर किसकी शरण में जाएगी? इसलिए आप यहाँ से मत जाइए| आपका वियोग होने पर भक्तजन पृथ्वी पर कैसे रह सकेंगे?
उद्दव जी के यह वचन सुनकर श्रीकृष्ण सोचने लगे कि मुझे भक्तों के लिए क्या व्यवस्था करनी चाहिए? तब भगवान ने अपनी सारी शक्ति भागवत में रख दी और अंतर्ध्यान हो होकर श्रीमदभगवतसमुद्र में प्रवेश कर गये| इसीलिए इस भगवतपुराण के दर्शन , सेवन, श्रवण, पाठ मात्र से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं|
जब भक्ति कलियुग में अपने पुत्र ज्ञान और वैराग्य की वृद्धावस्था को लेकर चिंतित थी, तब वह श्री नारादजी से अपने दुख का निवारण पूछती है| उसकी बात सुनकर नारदजी ने सनकादि मुनीश्वर से भक्ति के दुख के निवारण का उपाय पूछा|
सनकादि मुनीश्वर कहते हैं- श्रीमद् भागवत कथा वेद और उपनिषदों के सार से बनी है| अतः श्रीमदभगवतकथा की ध्वनि से कलियुग के सारे दोष नष्ट हो जाएँगे तथा ज्ञान और वैराग्य तरुण हो जाएँगे|
नारद जी कहते हैं- मैं भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की स्थापना करने के लिए भागवत शास्त्र की कथा द्वारा उज्ज्वल ज्ञान यग्य करूँगा| यह यग्य मुझे कहाँ करना चाहिए, कृपा करके वह स्थान बताइए|
सनकादि बोले- नारादजी हरिद्वार के पास आनंद नाम का घाट है| वह घाट बड़ा ही सुरम्य है| वहाँ आप ज्ञान यग्य आरंभ कर दीजिए|
इस प्रकार से सभी जगह इस कथा का हल्ला हो गया| जो जो श्री भागवत कथा के रसिक विष्णु भक्त थे, वह श्रीमद् भगवताम्रित का पान करने के लिए दौड़े दौड़े आने लगे| भृिगु, वसीष्ट, परशुराम आदि मुनिगन अपने पुत्रों तथा शिष्यों समेत प्रेम से आए| गंगा आदि नदियाँ, सरोवर, गंधर्व, दानव आदि भी कथा सुनने आए|
तब कथा सुनने के लिए दीक्षित होकर श्री कृष्ण परायण सनकादि नारदजी के दिए आसान पर विराजमान हुए| एक ओर ऋषिगन, एक ओर देवता, एक ओर वेद, एक ओर उपनिषद्, एक ओर तीर्थ और एक ओर स्त्रियाँ बैठीं|
सनकादि ने कहा-श्री भागवत कथा में 18000 श्लोक, 12 स्कंध हैं| यह कथा शुकदेव और राजा परीक्षित का संवाद है| नित्य भागवत का पाठ करना, भगवान का चिंतन करना, तुलसी को सींचना, गौ की सेवा करना| इन चारों में कोई अंतर नही है| इसे सुनने का कोई नियम नहीं है| इसे तो सर्वदा सुनना ही अच्छा है| किंतु, कलियुग में एसा होना कठिन है| अतः इसके लिए शुकदेवजी ने साप्ताह श्रवण की विधि बताई है| मन के संयम, रोगों की बहुलता और आयु की अल्पता के कारण कलियुग में साप्ताह श्रावण का विधान किया गया है|
जिस समय सनकादि मुनीश्वर साप्ताह श्रावण की महिमा का बखान कर रहे थे, उसी समय सभा में एक आश्चर्य हुआ| वहाँ तरुणावस्था को प्राप्त हुए अपने दोनों पुत्रों (ज्ञान और वैराग्य) को साथ लिए भक्ति बार बार "श्री कृष्ण !! गोविंद !! हरे !! मुरारे !! हे नाथ !! नारायण !! वासुदेव !! " आदि नामों का उच्चारण करती आकस्मात प्रकट हो गयी| सभी आश्चर्यचकित होकर एक दूसरे से पूछने लगे की यह यहाँ कैसे आई|
तब सनकादि ने बताया- यह भक्ति देवी अभी अभी कथा के अर्थ से निकली हैं|
भक्ति ने कहा- मैं कलियुग में नष्टप्राय हो गयी थी| आपने कथाम्रित से सींच कर मुझे फिर से पुष्ट कर दिया| अब आप यह बताइए कि मैं कहाँ रहूँ?
सनकादि ने कहा- तुम भक्तों को भगवान का स्वरूप प्रदान करने वाली हो| अतः तुम धेर्य धारण करके विष्णु भक्तों के हृदय में ही निवास करो| ये कलियुग के दोष भले ही सारे संसार पर अपना प्रभाव डालें, परंतु वहाँ तुम पर इनकी दृष्टि नहीं पड़ेगी|
इस प्रकार आग्या पाते ही भक्ति भगवद्भक्तों के हृदय में जा विराजी| जिनके हृदय में श्री हरी की भक्ति निवास करती है, वे अत्यंत निर्धन होने पर भी परम धन्य हैं| क्यूंकी इस भक्ति की डोरी से बँध कर स्वयं श्री हरी उनके हृदय में जा बसते हैं|
Note: Directly taken from Srimad Bhagwat
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